गुटनिरपेक्ष आंदोलन
NON- ALIGNED MOVEMENT
[ NAM ]
परिचय = गुटनिरपेक्षता ने द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। गुटनिरपेक्षता का सीधा एवं स्पष्ट संबंध शीत युद्ध से है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में शीत युद्ध की लहर दौड़ रही थी यह शीत युद्ध दो विचारधाराओं के बीच युद्ध था । इस दौरान विश्व दो गुटों में विभाजित हुआ था भारत के सर्वप्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्रता और विकास को गति देने अथवा गति कायम रखने के कारण एक नई विचारधारा गुटनिरपेक्षता को अपनाया ।सबसे पहले भारत द्वारा ही इस विचारधारा को अपनाकर विदेश नीति का निर्माण किया गया तथा कुछ समय पश्चात इस विचारधारा के जोर पकड़ते ही इसने वैश्विक आंदोलन का रूप धारण कर लिया। "गुटनिरपेक्ष आंदोलन राष्ट्रों की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है"
गुटनिरपेक्षता का अर्थ :-
गुटनिरपेक्ष शब्द 2 शब्दों को मिलाकर बना है :-
गुट + निरपेक्ष
गुट का अर्थ है खेमा
निरपेक्ष का अर्थ है किसी का पक्ष न लेना
यह शब्द हमें विभिन्न सैनिक गुटों से दूरी बनाए रखने पर बल देता है और उनके द्वारा किए गए कार्य और गुणों के आधार पर यह तय करता है कि वह सही है या गलत तथा उन पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
गुटनिरपेक्षता का उदय और विकास
गुटनिरपेक्षता की विचारधारा का उदय विकासशील एवं नव स्वतंत्र देशों द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात हुआ ।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व दो खेमों में बंटा हुआ था । जिसका नेतृत्व विश्व की 2 महाशक्तियों द्वारा किया जा रहा था एक और पूंजीवादी विचारधारा थी जिसका नेतृत्व अमेरिका ने किया तथा दूसरी और साम्यवादी विचारधारा थी जिसका नेतृत्व सोवियत संघ द्वारा किया गया।
गुटनिरपेक्षता की शुरुआत 5 देशों द्वारा की गई:-
भारत = पंडित जवाहरलाल नेहरू
मिस्र =नासिर
युगोस्लाविया =टीटो
इंडोनेशिया= सुक्रनो
घाना = खाम वे
इन सभी राजनेताओं ने स्वयं सैनिक खेमो से दूर रहने का निर्णय लिया तथा अन्य स्वतंत्र देशों को प्रेरणा दी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का औपचारिक रूप से उद्घाटन सितंबर 1961 बेलग्रेड सम्मेलन में हुआ ।गुटनिरपेक्षता के आंदोलन में लगभग लगभग 25 देशों ने भाग लिया जो बिना किसी संधि के गुटनिरपेक्षता पर आचरण करने वाले थे। इस सम्मेलन से पूर्व नेहरु एवं अन्य चार प्रथम सदस्यों द्वारा गुटनिरपेक्षता की सदस्यता प्राप्त करने हेतु गुट निरपेक्ष देश का दर्जा प्राप्त करने वाले देश के सामने निम्नलिखित शर्ते रखी । इन्हीं शर्तों पर खरा उतरने वाला देश गुटनिरपेक्ष का दर्जा प्राप्त कर पाएगा ।
गुटनिरपेक्षता की सदस्यता प्राप्त करने हेतु देश को शांतिपूर्ण स्वतंत्र रूप से विदेश नीति के अनुसार आचरण करना होगा।
वह देश पूर्ण रूप से उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद दोनों का विरोधी होना चाहिए
शीत युद्ध से संबंधित दोनों में से किसी भी सैनिक गुट का सदस्य नहीं होना चाहिए।
वह देश किसी महाशक्ति को अपने क्षेत्र में सैनिक अड्डे बनाने की अनुमति ना प्रदान करता हो या ना ही कभी उसको अनुमति दी हो।
उस देश की किसी महाशक्ति के साथ किसी भी प्रकार की कोई द्विपक्षीय संधि ना हुई हो।
वर्तमान समय में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के कुल 120 सदस्य देश है।
गुटनिरपेक्षता के उदय के कारण
शीत युद्ध होना
मनोवैज्ञानिक विवशता
सैनिक गुटों से पृथक रहना
स्वतंत्र विदेश नीति की अभिलाषा
आर्थिक विकास को तीव्रता प्रदान करना
गुटनिरपेक्षता के उदय के कारणों का विवेचन निम्न रूप से है:-
शीत युद्ध का होना = द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विश्व के दो विभिन्न विचारधारये उत्पन्न के कारण शीत युद्ध की उत्पत्ति हुई यह युद्ध दो सैनिक महाशक्तियों के बीच विचारों का युद्ध था। नव स्वतंत्र देशों ने दोनों ही महा शक्तियों यूएसएसआर और यूएसए से पृथक रहकर गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई
मनोवैज्ञानिक विवशता = नव स्वतंत्र देशों ने मनोवैज्ञानिक रूप से भी गुटनिरपेक्षता की नीति को बेहतर माना क्योंकि इससे अगर वह कभी भी किसी भी प्रश्न पर स्वतंत्र रूप से कार्यवाही करना चाहे तो कर सकते हैं और स्वतंत्र देश अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना चाहते थे जिसकी वजह से इन देशों ने गुटनिरपेक्षता की नीति पर भरोसा किया और उसे अपनाना उचित समझा।
सैनिक गुटों से पृथक रहना = सन 1945 के पश्चात बहुत से देश स्वतंत्र हुए यह सभी देश गरीब ,शोषित और पिछड़े हुए थे यदि यह देश किसी महाशक्ति का समर्थन करते तो इन्हें हथियारों की होड़ में शामिल होना पड़ता इन्हें शीत युद्ध में शामिल होना पड़ता जबकि यह देश तीव्रता से अपना आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास करना चाहते थे यह देश पैसों को अपने देश के विकास के लिए व्यय करना चाहते थे हथियारों की होड़ के लिए नहीं व्यय करना चाहते इसीलिये नव स्वतंत्रत और विकासशील देशों को गुटनिरपेक्षता की नीति बेहतर लगी जिसके कारण उन्होंने इस नीति को अपनाया।
स्वतंत्र विदेश नीति की अभिलाषा = नव विकसित देश गुटनिरपेक्षता के माध्यम से स्वयं को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखना चाहते थे यदि वह किसी गुट में शामिल हो जाते तो वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाने से वंचित रह जाते गुटनिरपेक्षता के अभाव में स्वतंत्र राष्ट्र को महा शक्तियों के इशारों पर नाचने के लिए मजबूर होना पड़ता और उनकी स्वतंत्र विदेश नीति की अभिलाषा चकनाचूर हो जाती।
आर्थिक कारण =गुटनिरपेक्षता को अपनाने का अन्य बड़ा कारण है आर्थिक कारण यह स्वतंत्र देश आर्थिक रूप से तीव्र गति से विकास करना चाहते थे किसी गुट में शामिल ना होने के कारण यह देश दोनों ही गुटों द्वारा सहायता प्राप्त कर सकते हैं इसलिए भी नव स्वतंत्र देशों को गुटनिरपेक्षता की नीति अच्छी लगी बजाय किसी गुट में शामिल होने के इस नीति के द्वारा इनके देश का आर्थिक विकास तीव्र गति से संभव हुआ।
गुटनिरपेक्षता का महत्व , पक्ष में तर्क तथा उपलब्धियां :-
■ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि
■ अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को टालना
■ निशस्त्रीकरण को बढ़ावा देना
■ शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना
■ उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का विरोध करना
■ विश्व बंधुत्व की भावना पर आधारित
■ परमाणु युद्ध की संभावना में कमी
■ गुटनिरपेक्षता शक्ति संतुलन के लिए आवश्यक
■ संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांतों में विश्वास
■ नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मांग
गुटनिरपेक्षता की प्रसंगिकता
गुटनिरपेक्षता का उदय शीत युद्ध की समाप्ति हेतु किया गया था परंतु 1961 सोवियत संघ के विघटन के द्वारा शीतयुद्ध की समाप्ति तो हो गई परंतु उसके पश्चात गुटनिरपेक्षता का आंदोलन समाप्त नहीं हुआ अब तो इसकी प्रसंगिकता और अधिक बढ़ गई क्योंकि इसका मकसद केवल सैनिक गुटों से दूरी बनाकर नहीं रखना था सिर्फ शांति को बढ़ावा देना मात्र नहीं था बल्कि सामाजिक , आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है वर्तमान समय में व्यक्तियों में जागरूकता पैदा करना इसका मकसद बन गया है गुट निरपेक्षता के द्वारा निशस्त्रीकरण को सफलतापूर्वक बढ़ावा दिया जा सकता है और दिया भी गया है इस नीति के द्वारा वैश्विक समस्याओं की जागरूकता पैदा की जा सकती है ।
वर्तमान समय में गुटनिरपेक्ष आंदोलन वास्तव में कितना प्रसांगिक है ?
ऐसा माना जा रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री भारत को विकास और सुरक्षा के जिस मार्ग पर ले जाना चाह रहे हैं उसके लिए अब गुट निरपेक्षता सार्थक नहीं है एक तर्क यह भी दिया जा सकता है कि इस आंदोलन का गठन ही असमान देशों को लेकर किया गया था इसीलिए इन देशों को आपस में जोड़ने वाले तत्व का अभाव है गुटनिरपेक्ष देशों ने भारत के कठिन समय में भारत का साथ कभी नही दिया चाहे वह 1962 का चीनी आक्रमण हो या 2002 का मुंबई आतंकवादी हमला फिर भी यह कहा जा सकता है कि गुटनिरपेक्ष देश किसी देश के साथ विशेष अवसर पर भले ही ना खड़े हुए हो लेकिन वैश्विक स्तर पर अनेक मुद्दे एक ही रहे हैं इस संगठन के अन्य देशों की समस्याओं से भारत ने भी अपने को अलग ही रखा है गुटनिरपेक्ष आंदोलन के पास कोई विशेष विचारधारा नहीं है जिससे चिपके रहने की आवश्यकता महसूस हो इसका गठन उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद व साम्यवाद के विरोध में किया गया था इसमें परमाणु निशस्त्रीकरण पर भी आम सहमति थी बाद में भारत ने ही परमाणु अप्रसार संधि से अलग होकर इस परंपरा को तोड़ दिया
सिंगापुर से लेकर सुबह तक के विभिन्न परिवेश के देशों का सदस्य होना इस संगठन की खूबसूरती है लेकिन मिस्र के इजरायल के तथा भारत के सोवियत संघ के साथ हुए समझौते विफल रहे हैं गुटनिरपेक्षता की निर्धनता के बारे में बहुत से तर्क दिए जा सकते हैं और दिए भी जा रहे हैं परंतु कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन पर विचार करने पर ऐसा लगता है कि इसकी सदस्यता बेमानी नहीं है अर्थात इस की प्रसंगिकता वर्तमान में भी कुछ हद तक कायम है।
गुटनिरपेक्ष संगठन का भारत के लिए महत्व
गुटनिरपेक्ष संगठन किसी से किस व्यक्ति के उत्थान में कोई अड़चन पैदा नहीं करता इसके सदस्य देश अपने विकास हेतु निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है पाकिस्तान के साथ बदलते रिश्तो को देखते हुए कोई गुटनिरपेक्ष देशों से अलग-थलग करने को सहमत ना हो परंतु आतंकवादी विरोधी हमारी मनोभावना के प्रदर्शन के लिए यह संगठन एक अच्छा मंच है भारत संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्यता प्राप्त करने का इच्छुक है। गुटनिरपेक्ष देशों का समर्थन उसकी इस मांग को वजनदार बनाता है भारत सरकार की विदेश नीति को अपना रहा है। उसको देखते हुए गुटनिरपेक्ष संगठन का महत्व आज भी कुछ हद तक कायम है|
BY NAMYA KATYAL
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